न्यायिक नियुक्तियों पर फिर छिड़ी बहस: अरविंद मल्होत्रा केस के बाद भारत के कॉलेजियम मॉडल की दक्षिण अफ्रीका से तुलना


‘अरविंद मल्होत्रा बनाम हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय’ मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया और उसकी पारदर्शिता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बहस के बीच दक्षिण अफ्रीका की न्यायिक नियुक्ति व्यवस्था भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तुलनात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम सिस्टम की महत्वपूर्ण भूमिका है जबकि दक्षिण अफ्रीका में जुडिशियल सर्विस कमीशन (Judicial Service Commission-JSC) के माध्यम से अपेक्षाकृत अधिक सार्वजनिक और सहभागी प्रक्रिया अपनाई जाती है।

न्यायिक नियुक्तियों पर फिर छिड़ी बहस अरविंद मल्होत्रा केस के बाद भारत के कॉलेजियम मॉडल की दक्षिण अफ्रीका से तुलना

दक्षिण अफ्रीका का न्यायिक नियुक्ति मॉडल

दक्षिण अफ्रीका ने न्यायिक नियुक्तियों के लिए एक संवैधानिक संस्था जुडिशियल सर्विस कमीशन (JSC) की व्यवस्था की है। इसका उद्देश्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, सहभागी और संस्थागत बनाना है।

JSC में वरिष्ठ न्यायाधीश, कानूनी पेशे से जुड़े लोग और कानून के जानकार शामिल होते हैं। इस व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अपेक्षाकृत सीमित रखा गया है ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखा जा सके।

नामांकन से शुरू होती है प्रक्रिया

दक्षिण अफ्रीका में न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया JSC द्वारा उम्मीदवारों से नामांकन मंगाने से शुरू होती है। प्राप्त नामांकनों के आधार पर उम्मीदवारों की शॉर्टलिस्ट तैयार की जाती है। इसके बाद उम्मीदवारों के संबंध में जनता से राय और टिप्पणियां भी मांगी जाती हैं। इससे नियुक्ति प्रक्रिया में सार्वजनिक भागीदारी का तत्व शामिल होता है।

सार्वजनिक इंटरव्यू और प्रसारण

दक्षिण अफ्रीका की व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता यह है कि JSC की कार्यवाही को राष्ट्रीय टेलीविजन और रेडियो चैनलों पर प्रसारित किया जाता है। शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों के सार्वजनिक इंटरव्यू होते हैं। इन इंटरव्यू के माध्यम से यह आकलन किया जाता है कि उम्मीदवार अदालत के विभिन्न स्तरों पर न्यायाधीश के पद के लिए कितना उपयुक्त है। इस प्रकार उम्मीदवार की योग्यता, अनुभव, दृष्टिकोण और न्यायिक पद के लिए उसकी उपयुक्तता का सार्वजनिक स्तर पर परीक्षण किया जाता है।

नियुक्ति पर सहमति न बनने की स्थिति

यदि JSC के सदस्य किसी उम्मीदवार की नियुक्ति को लेकर एकमत नहीं हो पाते हैं, तो मामले पर वोटिंग कराई जाती है। हालांकि, वोटिंग के दौरान कौन किस उम्मीदवार के पक्ष में या किस उम्मीदवार के खिलाफ वोट करता है, इसकी जानकारी गोपनीय रखी जाती है। इस प्रकार प्रक्रिया में सार्वजनिक विचार-विमर्श और गोपनीय मतदान दोनों का संतुलन दिखाई देता है।

दक्षिण अफ्रीका में न्यायिक जवाबदेही

न्यायिक स्वतंत्रता के साथ-साथ न्यायिक जवाबदेही भी दक्षिण अफ्रीकी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दक्षिण अफ्रीका में जजों को किसी विशेष प्रकार की इम्युनिटी या विशेष छूट प्राप्त नहीं होती। यदि किसी न्यायाधीश के गलत आचरण को लेकर शिकायत होती है, तो उसकी जांच जुडिशियल सर्विस कमीशन कर सकता है। गंभीर कदाचार के मामलों में संबंधित संवैधानिक संस्था संसद के माध्यम से महाभियोग (Impeachment) की सिफारिश कर सकती है। इस व्यवस्था से यह सिद्धांत सामने आता है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायाधीश सार्वजनिक या संवैधानिक जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त हों।

भारत में सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति

भारत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 124 में प्रावधान किया गया है। इसके तहत संवैधानिक अधिकारियों से सलाह-मशविरे के बाद राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है। व्यवहार में वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया में कॉलेजियम सिस्टम की महत्वपूर्ण भूमिका है। जब सुप्रीम कोर्ट में किसी न्यायाधीश का पद खाली होता है, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करते हैं। CJI सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों वाले कॉलेजियम से सलाह-मशविरा करके अपनी राय तैयार करते हैं। इसके अलावा, जिस हाई कोर्ट से संबंधित उम्मीदवार आता है, वहां के सबसे वरिष्ठ जज की राय भी ली जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका होने के कारण भारत की न्यायिक नियुक्ति व्यवस्था को न्यायिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखा जाता है।

कॉलेजियम सिस्टम क्या है?

कॉलेजियम सिस्टम वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा तबादले में न्यायपालिका की प्रमुख भूमिका होती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉलेजियम सिस्टम का उल्लेख संविधान में सीधे तौर पर नहीं किया गया है। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों के माध्यम से विकसित हुई, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘थ्री जजेज केस’ (Three Judges Cases) कहा जाता है। इन फैसलों ने न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका की प्रधानता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम

सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर कॉलेजियम में शामिल होते हैं:

  • भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)
  • सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों के लिए कुल पांच सदस्यीय कॉलेजियम की भूमिका होती है।

हाई कोर्ट कॉलेजियम

हाई कोर्ट के स्तर पर कॉलेजियम में शामिल होते हैं:

  • संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश
  • उस हाई कोर्ट के दो सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश

हाई कोर्ट कॉलेजियम संबंधित न्यायालय में नियुक्तियों तथा न्यायाधीशों के तबादले से संबंधित सिफारिशें करता है।

‘थ्री जजेज केस’ और कॉलेजियम का विकास

भारत में कॉलेजियम व्यवस्था किसी एक संवैधानिक संशोधन से अस्तित्व में नहीं आई बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन महत्वपूर्ण निर्णयों के माध्यम से इसका विकास हुआ। इन तीन प्रमुख मामलों को आम तौर पर ‘थ्री जजेज केस’ कहा जाता है:

  1. SP गुप्ता बनाम भारत संघ (1981)
  2. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1993)
  3. इन रे स्पेशल रेफरेंस नंबर 1 ऑफ 1998

इन फैसलों ने न्यायिक नियुक्तियों में न्यायपालिका की भूमिका और प्रधानता को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रक्रिया का ज्ञापन (MoP) क्या है?

MoP यानी Memorandum of Procedure (प्रक्रिया का ज्ञापन) सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित नियमों और प्रक्रियाओं का एक दस्तावेज है। इसे सरकार और न्यायपालिका के बीच निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े विभिन्न चरणों और संबंधित संस्थाओं की भूमिका का विवरण होता है। MoP की वर्तमान व्यवस्था के पीछे सुप्रीम कोर्ट के उपर्युक्त तीन महत्वपूर्ण फैसलों की भूमिका रही है। इन फैसलों के बाद केंद्र सरकार ने 1999 में एक MoP तैयार किया। इस प्रकार कॉलेजियम और MoP को समझना भारत की न्यायिक नियुक्ति व्यवस्था को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जजों की नियुक्ति को लेकर उठाए गए मुख्य मुद्दे

भारत और दक्षिण अफ्रीका की न्यायिक नियुक्ति व्यवस्थाओं की तुलना करते समय कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं—पारदर्शिता, न्यायिक स्वतंत्रता, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही।


1. पारदर्शिता बनाम गोपनीयता

  • न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया में गोपनीयता का अपना महत्व है। इससे उम्मीदवारों और न्यायाधीशों को बाहरी दबाव, अनावश्यक विवाद और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने से बचाया जा सकता है।
  • लेकिन दूसरी ओर, यदि प्रक्रिया में अत्यधिक गोपनीयता हो तो इससे मनमानेपन, पक्षपात और जवाबदेही की कमी की धारणा पैदा हो सकती है।
  • यही कारण है कि न्यायिक नियुक्तियों में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि गोपनीयता और पारदर्शिता के बीच संतुलन किस प्रकार बनाया जाए।

2. कॉलेजियम बनाम प्रतिनिधि संस्थाएं

  • भारत के कॉलेजियम सिस्टम में न्यायिक नियुक्तियों में मुख्य भूमिका न्यायाधीशों की होती है।
  • इसके विपरीत, एक प्रतिनिधि आयोग की व्यवस्था में न्यायपालिका के साथ-साथ कानूनी पेशे, शिक्षा जगत और अन्य संवैधानिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जा सकता है।
  • ऐसी व्यवस्था से व्यापक प्रतिनिधित्व और विभिन्न दृष्टिकोणों को शामिल करने की संभावना बढ़ती है।
  • हालांकि, इसमें एक बड़ी चुनौती भी है। यदि न्यायिक नियुक्तियों में राजनीतिक भागीदारी बहुत अधिक हो जाए, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर खतरा पैदा हो सकता है।
  • इसलिए किसी भी नियुक्ति व्यवस्था में प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ न्यायिक स्वतंत्रता की सुरक्षा भी सुनिश्चित करना आवश्यक है।

न्यायिक स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक जवाबदेही

न्यायपालिका लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों को कार्यपालिका और राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षा मिलना आवश्यक है। यदि न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकेगी, तो कानून के शासन और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा प्रभावित हो सकती है। लेकिन दूसरी ओर, न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ पूर्ण जवाबदेही का अभाव नहीं हो सकता।


न्यायाधीशों की स्वतंत्रता और संस्थागत जवाबदेही के बीच संतुलन लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था के लिए आवश्यक है। दक्षिण अफ्रीका का JSC मॉडल सार्वजनिक भागीदारी और जवाबदेही पर अधिक जोर देता है, जबकि भारत का कॉलेजियम मॉडल न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रधानता पर अधिक केंद्रित है।



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