महासागरों का संविधान है UNCLOS: मैग्सेसे विजेता टॉमी कोह का बड़ा बयान
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के विशेषज्ञ टॉमी कोह ने कहा है कि समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (United Nations Convention on the Law of the Sea—UNCLOS) आज भी महासागरों का “संविधान” है। यह टिप्पणी UNCLOS के उस व्यापक महत्व को रेखांकित करती है जिसके माध्यम से विश्व के महासागरों और समुद्रों में गतिविधियों के लिए एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था स्थापित की गई है।
महासागर पृथ्वी के पर्यावरण, वैश्विक व्यापार, ऊर्जा, खनिज संसाधनों, खाद्य सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय परिवहन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में विभिन्न देशों के समुद्री हितों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए एक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचे की आवश्यकता थी। UNCLOS इसी आवश्यकता को पूरा करने वाला प्रमुख वैश्विक समझौता है।
समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS) क्या है?
UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचा है, जो विश्व के महासागरों और समुद्रों में कानून-व्यवस्था तथा विभिन्न समुद्री गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इसे 1982 में अपनाया गया और 1994 में यह लागू हुआ। इसके लागू होने के बाद महासागरों और समुद्री क्षेत्रों से संबंधित विभिन्न अधिकारों, दायित्वों और गतिविधियों के लिए एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था विकसित हुई।
UNCLOS का उद्देश्य केवल समुद्री सीमाओं का निर्धारण करना नहीं है, बल्कि यह महासागरों और उनके संसाधनों के विभिन्न प्रकार के उपयोग के लिए नियम और कानूनी व्यवस्था निर्धारित करता है।
इसी व्यापक भूमिका के कारण इसे अक्सर “महासागरों का संविधान” (Constitution for the Oceans) कहा जाता है।
UNCLOS का महत्व
UNCLOS दुनिया के समुद्री क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की गतिविधियों को एक कानूनी आधार प्रदान करता है। इसके माध्यम से महासागरों और समुद्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा समुद्री संसाधनों के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम निर्धारित किए गए हैं।
इसका महत्व विशेष रूप से इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि महासागर किसी एक देश की संपत्ति नहीं हैं और इनके अनेक हिस्से राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर स्थित हैं। UNCLOS समुद्री संसाधनों के उपयोग और समुद्री गतिविधियों के संबंध में देशों के अधिकारों तथा दायित्वों के लिए एक साझा अंतरराष्ट्रीय ढाँचा उपलब्ध कराता है।
इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA)
UNCLOS की महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं में से एक इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (International Seabed Authority—ISA) की स्थापना है। राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर समुद्र की तलहटी में स्थित क्षेत्र और वहाँ उपलब्ध खनिज संसाधन अंतरराष्ट्रीय महत्व रखते हैं। इन क्षेत्रों में होने वाली माइनिंग तथा उससे संबंधित गतिविधियों को विनियमित करने के लिए ISA की स्थापना की गई है।
ISA की स्थापना का कानूनी आधार
इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संगठन है। इसकी स्थापना निम्नलिखित अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्थाओं के तहत हुई है:
- 1982 का समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS)
- 1994 का वह समझौता, जो UNCLOS के भाग XI (Part XI) के कार्यान्वयन से संबंधित है।
इस प्रकार ISA का अस्तित्व UNCLOS की व्यवस्था से सीधे जुड़ा हुआ है और समुद्र की तलहटी से संबंधित अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों को नियंत्रित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
ISA की सदस्यता
UNCLOS के सभी सदस्य देश इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA) के भी सदस्य हैं। वर्तमान में ISA में 170 सदस्य हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। भारत की सदस्यता समुद्री संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री शासन से जुड़े मुद्दों में उसकी भागीदारी को महत्वपूर्ण बनाती है।
ISA का मुख्यालय
इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी का मुख्यालय किंग्स्टन, जमैका में स्थित है।

