शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का 26वां शिखर सम्मेलन: बिश्केक घोषणा, नए फैसले, भारत के लिए महत्व और प्रमुख चुनौतियाँ


शंघाई सहयोग संगठन यानी Shanghai Cooperation Organisation (SCO) यूरेशियाई क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठन है, जिसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी समन्वय को मजबूत करना है। आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद जैसी साझा चुनौतियों से निपटने के साथ-साथ यह संगठन ऊर्जा, व्यापार, डिजिटल सहयोग, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग का मंच प्रदान करता है।

इसी क्रम में किर्गिस्तान में SCO का 26वां शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ। यह सम्मेलन संगठन की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विशेष महत्व रखता है। सम्मेलन में आतंकवाद-रोधी उपायों, नशीली दवाओं की तस्करी, जलवायु कार्रवाई, ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और डिजिटल सहयोग जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई तथा कई अहम फैसले लिए गए।

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का 26वां शिखर सम्मेलन बिश्केक घोषणा, नए फैसले, भारत के लिए महत्व और प्रमुख चुनौतियाँ

SCO के 26वें शिखर सम्मेलन की प्रमुख बातें

25वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित सम्मेलन

26वां SCO शिखर सम्मेलन संगठन की 25वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया। इस अवसर ने SCO की अब तक की यात्रा, उपलब्धियों और भविष्य की प्राथमिकताओं की समीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।

इस वर्ष के शिखर सम्मेलन का विषय था:

  • “SCO के 25 साल: स्थायी शांति, विकास और समृद्धि की ओर मिलकर”

यह थीम संगठन के मूल उद्देश्यों—क्षेत्रीय शांति, स्थिरता, विकास और सदस्य देशों के बीच सहयोग—को दर्शाती है।

आतंकवाद से लेकर डिजिटल सहयोग तक व्यापक एजेंडा

सम्मेलन केवल सुरक्षा मुद्दों तक सीमित नहीं रहा। इसमें आतंकवाद-रोधी उपायों के साथ-साथ जलवायु कार्रवाई, ऊर्जा सहयोग, आपदा प्रबंधन और डिजिटल सहयोग जैसे विषयों पर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई। इससे यह संकेत मिलता है कि SCO का एजेंडा समय के साथ पारंपरिक सुरक्षा चिंताओं से आगे बढ़कर व्यापक आर्थिक, पर्यावरणीय और तकनीकी सहयोग तक विस्तारित हो रहा है।

बिश्केक घोषणा का महत्व

शिखर सम्मेलन के दौरान ऐतिहासिक बिश्केक घोषणा को अपनाया गया। यह घोषणा SCO के सदस्य देशों के बीच साझा दृष्टिकोण और सहयोग की दिशा को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
बिश्केक घोषणा के माध्यम से सदस्य देशों ने क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा, स्थिरता और सहयोग को मजबूत करने की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया।

SCO में अंग्रेजी भाषा को शामिल किया गया

26वें शिखर सम्मेलन में अंग्रेजी को SCO की आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल किया गया। इससे संगठन में संचार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद की संभावनाओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अब तक SCO की आधिकारिक भाषाओं में रूसी और चीनी शामिल रही हैं। अंग्रेजी को शामिल किए जाने से संगठन के कामकाज और वैश्विक संवाद में एक अतिरिक्त भाषाई माध्यम उपलब्ध होगा।

सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए यूनिवर्सल सेंटर

SCO के नेताओं ने विभिन्न सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए एक यूनिवर्सल सेंटर स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की। यह पहल आतंकवाद, उग्रवाद, सीमा-पार अपराध और अन्य उभरती सुरक्षा चुनौतियों के खिलाफ सदस्य देशों के बीच सहयोग तथा सूचना-साझाकरण को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

ड्रग तस्करी के खिलाफ सहयोग

शिखर सम्मेलन में नशीली दवाओं की तस्करी और ड्रग्स से संबंधित अपराधों से निपटने पर भी विशेष जोर दिया गया। इसके लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय तथा 2030 तक नशीली दवाओं की लत से निपटने के लिए सहयोग कार्यक्रम की दिशा में कदम उठाए गए।

सीमा-पार नशीली दवाओं की तस्करी केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि इसका संबंध संगठित अपराध और आतंकवाद के वित्तपोषण से भी हो सकता है। इसलिए यह पहल भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
विशेष रूप से, ये उपाय सीमा-पार ड्रग तस्करी और नार्को-टेररिज्म के खिलाफ भारत के प्रयासों को समर्थन प्रदान कर सकते हैं।

SCO के गैर-सैन्य स्वरूप पर जोर

26वें शिखर सम्मेलन में SCO के गैर-सैन्य स्वरूप पर भी जोर दिया गया। सदस्य देशों ने ऐसे दृष्टिकोण को महत्व दिया जिसमें गुट-आधारित और टकराव वाले तरीकों को शामिल नहीं किया जाता।
यह SCO की उस मूल अवधारणा को दर्शाता है जिसमें सदस्य देशों के बीच सहयोग और संवाद के माध्यम से साझा चुनौतियों का समाधान खोजने पर बल दिया जाता है।

अफ्रीकी संघ के साथ सहयोग

शिखर सम्मेलन में SCO और अफ्रीकी संघ आयोग के बीच करीबी सहयोग को भी मंजूरी दी गई।
यह निर्णय SCO के सहयोग के भौगोलिक दायरे के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। अफ्रीकी देशों के साथ सहयोग बढ़ने से व्यापार, विकास, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और अन्य क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

लाहौर को SCO पर्यटन और सांस्कृतिक राजधानी का दर्जा

पाकिस्तान के लाहौर शहर को 2026-2027 के लिए SCO की पर्यटन और सांस्कृतिक राजधानी के रूप में नामित किया गया। इस तरह की पहल का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देना है।

पाकिस्तान को SCO की अध्यक्षता

किर्गिस्तान से पाकिस्तान SCO की अध्यक्षता संभालेगा और वर्ष 2027 में राष्ट्राध्यक्षों की परिषद की अगली बैठक की मेजबानी करेगा। अध्यक्षता मिलने से पाकिस्तान को संगठन के एजेंडे और गतिविधियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।

शंघाई सहयोग संगठन (SCO) क्या है?

शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organisation) एक प्रमुख यूरेशियाई बहुपक्षीय संगठन है। इसकी शुरुआत मुख्य रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा और विश्वास निर्माण से जुड़ी आवश्यकताओं के संदर्भ में हुई थी।
आज SCO का दायरा सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक, ऊर्जा, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और तकनीकी सहयोग तक विस्तृत हो चुका है।

शंघाई फाइव से SCO तक का सफर

SCO की शुरुआत “शंघाई फाइव” से हुई थी। 1996 में पूर्व सोवियत संघ के चार गणराज्यों और चीन के बीच सीमांकन तथा विसैन्यीकरण से संबंधित बातचीत की एक श्रृंखला के परिणामस्वरूप शंघाई फाइव का गठन हुआ।
इसके सदस्य थे:

  1. कजाकिस्तान
  2. चीन
  3. किर्गिस्तान
  4. रूस
  5. ताजिकिस्तान

इन देशों के बीच सीमा संबंधी विश्वास बढ़ाना और सैन्य गतिविधियों से जुड़े तनाव को कम करना इस प्रारंभिक व्यवस्था के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल था।

2001 में SCO का गठन

वर्ष 2001 में उज्बेकिस्तान के समूह में शामिल होने के बाद शंघाई फाइव का विस्तार हुआ और इसका नाम बदलकर शंघाई सहयोग संगठन (SCO) कर दिया गया। इस प्रकार शंघाई फाइव से SCO तक की यात्रा ने संगठन को एक व्यापक क्षेत्रीय मंच में बदल दिया।

SCO के प्रमुख उद्देश्य

SCO के प्रमुख उद्देश्यों में मध्य एशियाई क्षेत्र में:

  • आतंकवाद को रोकना,
  • अलगाववाद का मुकाबला करना,
  • उग्रवाद को रोकना,
  • क्षेत्रीय सुरक्षा मजबूत करना,
  • सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना,
  • आर्थिक एवं ऊर्जा सहयोग को बढ़ावा देना,
  • सांस्कृतिक एवं मानवीय संपर्क मजबूत करना शामिल हैं।

SCO के सदस्य देश

वर्तमान संरचना के अनुसार SCO में 10 पूर्ण सदस्य देश हैं:

  1. चीन
  2. रूस
  3. भारत
  4. पाकिस्तान
  5. ईरान
  6. बेलारूस
  7. कजाकिस्तान
  8. किर्गिस्तान
  9. ताजिकिस्तान
  10. उज्बेकिस्तान

इनमें से चार देश—कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान—मध्य एशिया के देश हैं।

भारत की SCO में भूमिका

भारत 2017 में SCO का पूर्ण सदस्य बना। भारत के साथ पाकिस्तान को भी पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल किया गया था। भारत ने 2023 में SCO की रोटेटिंग चेयरमैनशिप यानी बारी-बारी से मिलने वाली अध्यक्षता संभाली।
भारत की SCO में भागीदारी उसके लिए मध्य एशिया, रूस, चीन और अन्य यूरेशियाई देशों के साथ संवाद बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

वैश्विक GDP और जनसंख्या में SCO की हिस्सेदारी

SCO के सदस्य देश सामूहिक रूप से विश्व अर्थव्यवस्था और वैश्विक जनसांख्यिकी में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
सदस्य देश वैश्विक GDP का लगभग 30 प्रतिशत और दुनिया की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। इस कारण SCO केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी प्रभावशाली संगठन माना जाता है।

SCO में ऑब्जर्वर देश

SCO में अफगानिस्तान और मंगोलिया को ऑब्जर्वर का दर्जा प्राप्त है। ऑब्जर्वर देश संगठन की गतिविधियों और चर्चाओं से जुड़ सकते हैं, हालांकि पूर्ण सदस्य देशों के समान अधिकार उन्हें प्राप्त नहीं होते।

SCO की भाषाएँ

SCO की आधिकारिक भाषाएँ रूसी और चीनी हैं। 26वें शिखर सम्मेलन में अंग्रेजी को भी शामिल किया गया है। इससे संगठन के भीतर संवाद और अंतरराष्ट्रीय संचार को व्यापक बनाने में सहायता मिल सकती है।

SCO की संगठनात्मक संरचना

SCO की सबसे बड़ी निर्णय लेने वाली संस्था Council of Heads of States (CHS) यानी राष्ट्राध्यक्षों की परिषद है। इसकी बैठक सामान्यतः वर्ष में एक बार होती है।
CHS संगठन की व्यापक दिशा, प्रमुख नीतियों और महत्वपूर्ण निर्णयों को निर्धारित करने वाली शीर्ष संस्था है।

SCO की दो स्थायी संस्थाएँ

SCO की दो प्रमुख स्थायी संस्थाएँ हैं:

1. सचिवालय

  • SCO का सचिवालय बीजिंग में स्थित है। यह संगठन की प्रशासनिक और समन्वय संबंधी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. Regional Anti-Terrorist Structure (RATS)

  • SCO की दूसरी स्थायी संस्था Regional Anti-Terrorist Structure (RATS) की कार्यकारी समिति है, जो ताशकंद में स्थित है।
  • RATS का प्रमुख उद्देश्य आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद जैसी सुरक्षा चुनौतियों के खिलाफ सदस्य देशों के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत करना है।

भारत के लिए SCO का महत्व

SCO भारत की विदेश नीति और यूरेशियाई क्षेत्र में रणनीतिक भागीदारी के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

1. क्षेत्रीय सुरक्षा

  • आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ भारत की प्रमुख सुरक्षा चिंताओं में शामिल हैं।
  • SCO इन चुनौतियों पर चर्चा और सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच उपलब्ध कराता है।
  • RATS के माध्यम से आतंकवाद-विरोधी सहयोग
  • SCO के Regional Anti-Terrorist Structure (RATS) के माध्यम से भारत अन्य सदस्य देशों के साथ इंटेलिजेंस शेयरिंग और आतंकवाद-विरोधी प्रयासों में सहयोग करता है।
  • यह सहयोग सीमा-पार आतंकवाद और आतंकवादी नेटवर्क से जुड़ी गतिविधियों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण है।

2. चीन और पाकिस्तान के साथ संतुलन

  • चीन और पाकिस्तान दोनों SCO के सदस्य हैं और भारत के साथ उनके संबंधों में कई रणनीतिक चुनौतियाँ मौजूद हैं।
  • ऐसी स्थिति में SCO भारत को एक ही मंच पर दोनों देशों के साथ संवाद करने तथा अपनी चिंताओं को स्पष्ट रूप से रखने का अवसर देता है।
  • यह मंच भारत को भारत-विरोधी नैरेटिव बनने से रोकने और अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का अवसर भी प्रदान करता है।

3. ऊर्जा सुरक्षा

  • मध्य एशिया प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र है। यहां तेल, गैस और यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधन उपलब्ध हैं।
  • SCO की सदस्यता भारत को मध्य एशियाई देशों के साथ अपने ऊर्जा संबंधों को मजबूत करने का अवसर देती है।
  • भारत के लिए दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिहाज से यह सहयोग विशेष महत्व रखता है।

4. आर्थिक सहयोग

  • SCO सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने का भी प्रयास करता है।
  • भारत के लिए इसका अर्थ है कि संगठन के माध्यम से व्यापार, निवेश और आर्थिक साझेदारी के नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
  • विशेष रूप से मध्य एशियाई देशों के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने में SCO महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

5. मध्य एशिया से जुड़ाव

  • भारत की विदेश नीति में मध्य एशिया का विशेष महत्व है।
  • मध्य एशिया रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में भी समृद्ध है। भारत इस क्षेत्र के देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना चाहता है।
  • हालांकि, मध्य एशिया तक भारत की भौतिक और आर्थिक पहुंच में कई चुनौतियाँ हैं। ऐसे में SCO भारत को इस क्षेत्र के देशों के साथ नियमित उच्चस्तरीय संवाद का अवसर प्रदान करता है।

भारत के लिए SCO की प्रमुख चुनौतियाँ

SCO भारत के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं।

1. चीन-पाकिस्तान गठजोड़

  • SCO के भीतर चीन और पाकिस्तान की मजबूत साझेदारी भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती है।
  • कई बार यह साझेदारी क्षेत्रीय सुरक्षा से संबंधित चर्चाओं में भारत के प्रभाव को सीमित कर सकती है।
  • भारत को इसलिए SCO में अपने हितों की रक्षा करते हुए दोनों देशों के साथ संतुलित कूटनीतिक जुड़ाव बनाए रखना पड़ता है।

2. भू-राजनीतिक तनाव

  • चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के सीमा विवाद और व्यापक भू-राजनीतिक तनाव SCO के मंच पर भी प्रभाव डाल सकते हैं।
  • ऐसी परिस्थितियों में साझा मुद्दों पर रचनात्मक सहयोग करना भारत के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

3. सुरक्षा पर अधिक जोर

  • SCO की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मुख्य प्राथमिकताओं में सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है।
  • हालांकि सुरक्षा सहयोग आवश्यक है, लेकिन कभी-कभी सुरक्षा मुद्दों पर अत्यधिक ध्यान आर्थिक और विकासात्मक सहयोग को पीछे छोड़ सकता है
  • भारत के लिए व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और विकासात्मक सहयोग भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

4. संस्थागत सीमाएँ

  • SCO में महत्वपूर्ण निर्णय आम सहमति के आधार पर लिए जाते हैं।
  • आम सहमति की व्यवस्था संगठन के सभी सदस्यों के हितों को ध्यान में रखने में मदद करती है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह है कि संवेदनशील मुद्दों पर निर्णय लेने और ठोस प्रगति करने में अधिक समय लग सकता है।



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